15.9.14

मुझे मेरी जिंदगी का मकसद मिल गया-जीनेशा बिंगम


अमेरिकी पूर्व नौसैनिक जीनेशा  की इस्लाम अपनाने की दास्तां।

जीनेशा बिंगम (जीनेशा ने इस्लाम अपनाने के बाद आइशा नाम रखा है) अमेरिकी नौसेना में एक सैनिक के रूप में कार्यरत्त  थी। जीनेशा की जिंदगी में कई तरह के उतार चढ़ाव आए। उनका जीवन बाल्यवस्था में यौन शोषण से गुजरते हुए, फिर अफगानिस्तान के युद्ध क्षेत्र से लास वैगास के नाइट क्लब होते हुए अस्पताल के बिस्तर पर इस्लाम अपनाकर सुकून हासिल करते हुए आगे बढ़ता है। 
जीनेशा की जुबां से जानिए उनकी इस्लाम अपनाने की कहानी।

मेरा नाम जीनेशा बिंगम (इस्लाम अपनाने के बाद जीनेशा बिंगम) है। मैं मोरमन कैथोलिक ईसाई धर्म में पैदा हुई। मैं पच्चीस साल की हूं। मैं अमेरिका के लास वेगास शहर में जन्मी,पली बढ़ी और कॉलेज की पढ़ाई की।
मेरा पारिवारिक माहौल बेहद गंदा था। मेरे पिता अक्सर मुझे झिाड़कते और पीटते थे। मेरी मां मुझे उनके उत्त्पीडऩ से बचाने में लगी रहती थी। पिता मेरी मां की भी पिटाई करते थे। मेरे दादा यौनाचारी थे। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि  वे मुझे अपनी हवस का शिकार बना सकते हैं। मेरे दादा ने मेरी मां, मेरी बहिन और मेरे साथ बलात्कार किया। जब भी मेरे पिता शराब पीए हुए होते तो हम समझ लेते थे कि घर में हम में से कोई ना कोई जख्मी जरूर होगा। मेरे पिता मुझे लज्जित करने के लिए मेरे रिश्तेदारों और मित्रों के सामने बुरी तरह पीटते थे। मैं अक्सर सोचती ईश्वर मेरे साथ आखिर ऐसे क्यों होने दे रहा है। ऐसे उत्पीड़क और घुटनभरे माहौल में मैं बड़ी  हुई। जब मैं चौदह साल की हुई तो मेरी मां हम भाई बहिनों को लेकर घर छोड़कर आ गई। जिस रात हम निकले हमारे पिता ने हमें गाड़ी से कुचलने की कोशिश की। पिता से छुटकारा लेकर हम पांचों एक महान शख्स की शरण में चले गए। उस शख्स ने हम भाई-बहिनों को अपनी संतान की तरह रखा। यहां हमें ऐसा लगा मानों हम ईश्वर की कृपा में आ गए। यह शख्स नास्तिक होने के बावजूद भला आदमी था।
इस बीच मैंने हाई स्कूल पास किया और मैं नौ सेना में भर्ती हो गई। मैं छठी मेरीन बटालियन की एक टुकड़ी में रेडियो ऑपेरटर थी। यह बटालियन अमेरिका की सबसे ज्यादा प्रतिष्ठित बटालियन होने के साथ ही खतरनाक जंग में हिस्सा लेने की काबिलियत रखती थी। हमारी बटालियन को मार्च 2008 में अफगानिस्तान के गार्मसिर में तालिबान से लडऩे के लिए भेजा गया। हमारी तालिबानियों से चार महीने तक  जंग चलती  रही। इसी जंग में हमारी एक साथी को गोली लगी। हमें आदेश मिला कि उस साथी की मदद की जाए ताकि उसे मेडिकल सहायता उपलब्ध कराई जा सके। दोनों तरफ गोलीबारी के बीच हम अपने साथी को बचाने की कोशिश के बीच ही एक गोली मेरे चेहरे के नजदीक से दनदनाती हुई गुजरी। गोली नजदीक से गुजरने से मुझे दो दिनों तक अपने बाएं कान से कुछ भी सुनाई नहीं दिया। मुझे लगा मानो मौत मुझे छूकर चली गई हो। हमारे टीम लीडर ने हमें बता रखा था कि युद्ध के मोर्चे पर किसी को भी नास्तिक नहीं रहना चाहिए। मैं गोलीबारी के बीच आगे बढ़ती रही और ईश्वर से प्रार्थना करती रही कि वह मेरी हिफाजत करे। हालांकि सच्चाई यह है कि  उस वक्त ईश्वर में मेरी सच्ची आस्था नहीं थी। हम उस घायल नौसेनिक को स्टे्रचर पर लेकर आगे बढ़े। मैंने उस घायल सैनिक को देखकर महसूस किया मानो उसकी आत्मा उसके शरीर को छोड़कर बाहर आ रही हो।

25.6.14

मैं हिजाब में खुद को बेहद कम्फर्ट फील करती हूं-अलेना

उनतीस वर्षीय अलेना काटकोवा रूस के साइबेरिया की है, लेकिन वे न्यूजीलैंड में कॉल सेंटर ऑपरेटर के रूप में काम करती है। जानिए उन्हीं से आखिर क्यों अपनाया उन्होंने इस्लाम।
मेरा जन्म रूस में हुआ। रूस जहां कोई धार्मिक माहौल नहीं था। मैं सन् 2008 में न्यूजीलैंड आ गई। न्यूजीलैंड एक ऐसा मुल्क है जहां कई देशों के लोग रहते हैं,जहां विभिन्न तरह की सभ्यताएं और धर्म हैं। जब मैंने न्यूजीलैंड की ऑकलैंड यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलोजी में पढ़ाई शुरू की तो वहां मेरी मुलाकात कई ऐसे स्टूडेंट्स से हुई जो मुसलमान थे। मैंने उत्सुकता और जिज्ञासा से इस्लाम संबंधी उनसे कई तरह के सवाल पूछना शुरू किया। उनसे पूछे जाने वाले सवाल दर सवाल का ही नतीजा है कि मैं इस्लाम अपनाकर मुसलमान हूं। इस्लाम ने मेरी जिंदगी को बिल्कुल ही बदल कर रख दिया। इस्लाम ने मुझे ईमानदार बना दिया और खासतौर पर मेरे व्यक्तित्व में बेहतर निखार आया।  इस्लाम अपनाने से पहले मैं दोस्तों के साथ पार्टी-क्लब वगैरह में खूब जाया करती थी, लेकिन इस्लाम अपनाने के बाद मैंने यह सब छोड़ दिया है।
मुसलमान बनने के बाद जबसे मैंने इस्लामी परिधान हिजाब पहनना शुरू किया है, लोगों का मेरे साथ व्यवहार बदल गया और वे मुझे पहले के बजाय अधिक इज्जत और सम्मान देने लगे।   इस्लाम के मुताबिक हम मुस्लिम महिलाएं मर्दों से हाथ नहीं मिला सकती, ना गले मिल सकती और ना ही चुंबन ले सकती हैं, यही वजह है कि मैं इन सबसे बचती हूं। मैं किसी पुरूष से मिलती भी हूं तो कहती हूं,' आपसे मिलकर अच्छा लगा, लेकिन माफी चाहूंगी कि मेरा मजहब आपसे हाथ मिलाने की मुझे इजाजत नहीं देता है।' वे समझ जाते हैं और मुस्कराने लगते हैं । वैसे भी न्यूजीलैंड एक उदार मुल्क है। हालांकि मुझे अपने परिवार की तरफ से कुछ चुनौतियां मिली, मेरी छोटी बहिन अभी भी यह समझ नहीं पाई और ना ही स्वीकार पाई है कि मैं मुसलमान बन गई हूं।
रूस में तो लोग अभी भी मुसलमानों को आतंकवादी के रूप में ही समझते हैं। दरअसल मीडिया मुसलमानों को इसी रूप में प्रस्तुत करता है। मैं इस्लामी पहनावे हिजाब में खुद को बेहद कम्फर्ट फील करती हूं। मैं अपना जॉब बदलने की सोच रही हूं क्योंकि मैं टीचर के रूप में योग्यता रखती हूं और पहल मैं टीचर बनने की ही सोचती थी।

8.6.14

बिकनी नहीं, इस्लामी पर्दा है औरत की आजादी का प्रतीक: सारा बॉकर

अमेरिका की पूर्व मॉडल, फिल्म एक्टे्रस, फिटनेस इंस्ट्रेक्टर सारा बॉकर ने अपनी ऐशो आराम और विलासितापूर्ण जिंदगी को छोड़कर इस्लाम अपना लिया। बिकनी पहनकर खुद को पूरी तरह आजाद कहने वाली सारा अब खुद इस्लामी परिधान 'हिजाब' पहनती हैं और कहती है कि महिला की सच्ची आजादी पर्दा करने (हिजाब) में है ना कि आधे -अधूरे कपड़े पहनकर अपना जिस्म दिखाने में।
पढि़ए सारा बॉकर की जुबानी कि कैसे वो अपने ठाट-बाठ वाली जिंदगी को छोड़कर इस्लाम की शरण में आई।

मैं अमेरिका के हार्टलैंड में जन्मी। अपने आसपास मैंने ईसाई धर्म के विभिन्न पंथों को पाया। मैं अपने परिवार के साथ कई मौकों पर लूथेरियन चर्च जाती थी। मेरी मां ने मुझे चर्च जाने के लिए काफी प्रोत्साहित किया और मैं इस तरह लूथेरियन चर्च की पक्की अनुयायी बन गई। मैं ईश्वर में पूरा यकीन करती थी लेकिन चर्च से जुड़े कई रिवाज मुझे अटपटे लगते थे और मेरा इन बातों पर भरोसा नहीं था जैसे कि चर्च में गाना, ईसा मसीह और क्रॉस की तस्वीरों की पूजा और 'ईसा की बॉडी और खून' को खाने की परंपरा।
धीरे-धीरे मैं अमेरिकी जीवनशैली में ढलती गई और और आम अमेरिकी लड़कियों की तरह बड़े शहर में रहने, ग्लेमरस लाइफ-स्टाइल, ऐशो आरामपूर्ण जिंदगी पाने की तलब मुझमें बढ़ती गई। भव्य जीवनशैली की चाहत के चलते ही मैं मियामी के साउथ बीच में चली गई जो कि फैशन का गढ़ था। मैंने वहां समुद्र के किनारे घर ले लिया। अपना ध्यान खुद को खूबसूरत दिखाने पर केन्द्रित करने लगी। मैं अपने सौदंर्य को बहुत महत्व देती थी और ज्यादा से ज्यादा लोगों का ध्यान खुद की ओर चाहती थी। मेरी ख्वाहिश रहती थी कि लोग मेरी तरफ आकर्षित  रहे। खुद को दिखाने के लिए मैं रोज समुद्र किनारे जाती। इस तरह मैं हाई फाई लाइफ स्टाइल और फैशनेबल जीवन जीने लगी। धीरे-धीरे वक्त गुजरता गया लेकिन मुझे  एहसास होने लगा कि जैसे-जैसे मैं अपने स्त्रीत्व को चमकाने और दिखाने के मामले में आगे बढ़ती गई, वैसे-वैसे मेरी खुशी और सुख-चैन का ग्राफ नीचे आता गया। मैं फैशन का गुलाम बनकर रह गई थी। मैं अपने खूबसूरत चेहरे का गुलाम बनकर रह गई थी। मेरी जीवनशैली और खुशी के बीच गैप बढ़ता ही गया। मुझे अपनी जिंदगी में खालीपन सा महसूस होने लगा। लगता था बहुत कुछ छूट रहा है। मानो मेरे दिल में सुराख हो। खालीपन की यह चुभन मेरे अंग-अंग को हताश, निराश और दुखी बनाए रखती थी। किसी भी चीज से मेरा यह खालीपन और अकेलापन दूर होता नजर नहीं आता था। इसी निराशा और चुभन के चलते मैंने शराब पीना शुरू कर दिया। नशे की लत के चलते मेरा यह खालीपन और निराशा ज्यादा ही बढ़ते  गए। मेरी इन सब आदतों के चलते मेरे माता-पिता ने मुझसे दूरी बना ली। अब तो मैं खुद अपने आप से भागने लगी।
फिटनेस इन्सट्रक्टर आदि के काम में मुझे जो कुछ पैसा मिलता वह यंू ही खर्च हो जाता। मैंने क/ई के्रडिट कार्ड ले लिए, नतीजा यह निकला कि मैं कर्ज में डूब  गई। दरअसल खुद को सुंदर दिखाने पर मैं खूब खर्च करती थी। बाल बनाने, नाखून सजाने, शॉपिंग माल जाने और जिम जाने आदि में सब कुछ खर्च हो गया। उस वक्त मेरी सोच थी कि अगर मैं लोगों के  आकर्षण का केन्द्र बनूंगी तो मुझे  खुशी मिलेगी। लोगों के देखने पर मुझे  अच्छा लगेगा। लेकिन इस सबका नतीजा उल्टा निकला। इस सबके चलते मेरे दुख, निराशा और बेचैनी का ग्राफ बढ़ता ही गया।

22.5.14

इंग्लैंड की महिला जज ने कुबूल किया इस्लाम


अल्लाह की मेहरबानी है कि उसने मेरा मार्गदर्शन किया...मॉरनिंगटॉन
'सर्वशक्तिमान ईश्वर ने मुझे सच्ची राह दिखाई जिसके अलावा कोई और सीधा और सच्चा रास्ता नहीं है। मैं जितना ज्यादा इस्लाम और पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. के बारे में जानती और समझती गई मुझे एहसास होता चला गया कि मैं उसी राह पर चल रही हूं जिसकी मुझे तलाश थी और यही वह राह है जहां मुझे होना चाहिए था।'
यह कहना है इंग्लैंड की महिला जज मैरीलीन मॉरनिंगटॉन का जिन्होंने इस्लाम को समझने के बाद इसे अपना लिया।
मैरीलीन मॉरनिंगटॉन इंग्लैंड में जिला न्यायाधीश ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय लेक्चरर और घरेलू हिंसा व पारिवारिक कानून विषय की लेखिका हैं। मैरीलीन मॉरनिंगटॉन ने 1976 में वकालत की डिग्री हासिल की और 1976 से लिवरपूल में पारिवारिक कानून से जुड़े मामलों की प्रेक्टिस करने लगी। वे चालीस साल की उम्र में 1994 में लिवरपूल के नजदीक स्थित ब्रिकेनहेड शहर में डिस्ट्रिक्ट जज के पद पर नियुक्त हुईं। मॉरनिंगटॉन चालीस साल की उम्र में जिला न्यायाधीश के पद पर नियुक्त होने वाली पहली वकील थीं। मैरीलीन वल्र्ड एकेडमी ऑफ आर्ट्स एंड सांइस की शोधार्थी के रूप में चुनी गईं। मैरीलीन घरेलू हिंसा से जुड़े मामलों की अच्छी जानकार है और उन्हें इस क्षेत्र में काफी सम्मान की नजर से देखा जाता है और इस फील्ड से जुड़े  विभिन्न ओहदों पर वे कार्यरत्त हैं । इस्लाम अपनाने से पहले दस से बारह वर्षों तक उन्होंने महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाली हिंसा से जुड़े केसों पर काम किया। मुसलमानों के बीच जाकर भी उन्होंने महिला और बच्चों के खिलाफ होने वाली हिंसा का अध्ययन किया। मुस्लिम कम्युनिटी में इस मसले को बेहतर तरीके से समझने के लिए उन्होंने इस्लाम का अध्ययन शुरू कर दिया और मुसलमानों के बीच घुलने-मिलने लगीं

28.2.14

अमेरिकी महिला सैनिक विक्टोरिया को इस्लाम में मिला जिंदगी का मकसद

सिस्टर विक्टोरिया (अब आयशा) की इस्लाम अपनाने की दास्तां बड़ी दिलचस्प है। उनका पहली बार मुसलमान और इस्लाम से सामना 2002 में तब हुआ जब उन्होंने सेना की नौकरी जॉइन की और सऊदी अरब के सैनिकों के सम्पर्क में आई। और फिर उन्होंने साल 2011 में इस्लाम अपना लिया । अपनी जिंदगी में घटित एक दुखद घटना और कुरआन और हदीस (पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. की शिक्षाओं) का अध्ययन के बाद उन्हें अपनी जिंदगी का मकसद इस्लाम में ही नजर आया।

अस्सलामु अलैकुम
मेरा नाम विक्टोरिया एरिंगटोन (अब आयशा) है। मैं जॉर्जिया में पैदा हुई और गैर धार्मिक ईसाइ परिवार में पली-बढ़ी। मैंने गैर धार्मिक इसलिए कहा है क्योंकि हम अक्सर चर्च नहीं जाते थे और मेरे माता-पिता शराबी और स्मोकर थे। मेरे माता-पिता के बीच उस वक्त तलाक हो गया था जब मैं युवा थी। तलाक के बाद मेरी मां ने चार बार विवाह किया। मेरे पिता अक्सर काम के सिलसिले में सफर पर ही रहते थे और वे घर पर कम ही रुकते थे। इन हालात से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि मेरी पारिवारिक जिंदगी सामान्य नहीं रही।
ईसाइयत से जुड़े कई सवाल अक्सर मेरे दिमाग में घूमते रहते थे। जैसा कि ईसाइ मानते हैं कि ईसा मसीह पूरे इंसानों के गुनाहों की खातिर सूली पर चढ़े हैं। मैं सवाल उठाती थी अगर हमें ईसा मसीह के सूली पर चढऩे की वजह से पहले ही अपने गुनाहों की माफी मिल गई है तो फिर हमें नेक काम करने की आखिर जरूरत क्यों है? मनाही के बावजूद आखिर हम सुअर का गोश्त क्यों खाते हैं? आखिर एक ही वक्त में ईश्वर, ईश्वर और ईसा कैसे हो सकता है? यानी एक ईश्वर दो रूपों में वह भी एक ही वक्त में! ऐसे कई सवाल अक्सर मेरे जहन में उठते थे। मैं इन सवालों का जवाब चाहती थी लेकिन न परिवारवालों के पास और न ही पादरियों के पास मेरे इन सवालों का जवाब था। मेरे यह सवाल अनुत्तरित ही रहे।
साल 2002 में मैंने सेना की नौकरी जॉइन की और टे्रनिंग के दौरान मैं कई मुस्लिम सऊदी अरब के सैनिकों के सम्पर्क में आई। यह इस्लाम से मेरा पहला परिचय था। हालांकि उस वक्त धर्म को लेकर मैं संजीदा नहीं थी। दरअसल मेरी जिंदगी में एक अहम मोड़ 2010 में आया जब मुझे एक गंभीर पारिवारिक संकट का सामना करना पड़ा क्योंकि मेरे ईसाइ पति ने मुझे तलाक दे दिया था। इसी बीच मेरी मुलाकात एक शख्स से हुई जो मुस्लिम था। मैंने उस मुुस्लिम शख्स की जिंदगी के विभिन्न पहलुओं और गतिविधियों पर गौर किया। उससे इस्लाम से जुड़े कई सवाल पर सवाल किए। उस मुस्लिम शख्स ने मुझ पर कभी भी इस्लाम नहीं थोपा बल्कि मुझसे कहा कि आप फलां-फलां किताबें पढें। उसने मुझो इस्लाम पर कई किताबें और कुरआन दी। मैंने पूरा कुरआन पढ़ डाला और बहुत कुछ बुखारी (इसमें मुहम्मद सल्ल. की शिक्षाएं संकलित हैं।) भी। इस्लाम पर और भी अनगिनत किताबें मैने पढ़ डाली। मैंने अपने हर एक सवाल का जवाब इस्लाम में पाया। मैंने इस्लाम में जिंदगी से जुड़े हर पहलू पर रोशनी पाई। मुझे हर एक मसले का समाधान इस्लाम में नजर आया। अब मैं जान चुकी थी कि यही एकमात्र रास्ता है जो मुझे सिखाता है कि मुझो अपनी जिंदगी किस तरह गुजारनी चाहिए।
मुझे अपने सवालों के जवाब चाहिए थे। मैं एक गाइड बुक चाहती थी जिसके मुताबिक मैं अपनी जिंदगी गुजार सकूं, और आखिर इसी के चलते मैनें दिसम्बर 2011 में इस्लाम अपना लिया।

29.11.13

नेपाल की अभिनेत्री पूजा लाम्बा इस्लाम की शरण में

नेपाल की मशहूर अभिनेत्री और मॉडल 31 वर्षीय पूजा लाम्बा ने लगभग तीन साल पहले इस्लाम अपना लिया। उनके इस्लाम अपनाने से भारत और नेपाल के कई लोग हैरत में हैं। बौद्ध परिवार में पली बढ़ी पूजा लाम्बा ने काठमांडू में इस्लाम कुबूल करने का ऐलान किया। पेश है उस दौरान पूजा लाम्बा से हुइ बातचीत के प्रमुख अंश।

किस बात से प्रभावित होकर आपने इस्लाम अपनाया?
मैं बौद्ध परिवार में पैदा हुई। एक साल पहले मैंने दूसरे धर्मों का अध्ययन करने का इरादा किया। मैंने हिंदू, ईसाई और इस्लाम मजहब का तुलनात्मक रूप में अध्ययन किया। विभिन्न धर्मों को समझने और जांचने के दौरान ही मैं कतर और दुबई गई और वहां मैं इस्लामिक सभ्यता से बेहद प्रभावित हुई। इस्लाम की एक बहुत बड़ी खूबी एक ईश्वर को मानना और उसी पर पूरी तरह यकीन करना है। एक ईश्वर को लेकर ऐसा मजबूत यकीन मैंने दूसरे धर्मो में नहीं देखा।
पूरी दुनिया का मीडिया इस्लाम के खिलाफ दुष्प्रचार कर रहा है और इस्लाम को आंतकवाद बढ़ाने वाले धर्म के रूप में पेश कर रहा है। क्या आप मीडिया के इस दुष्प्रचार से प्रभावित नहीं हुई?
सच्चाई यह है कि इस्लाम के खिलाफ मीडिया के दुष्प्रचार के कारण ही मैं इस्लम को अपना पाई, क्योंकि मैंने अध्ययन के दौरान इस्लाम को मीडिया के दुष्प्रचार के विपरीत एक अच्छा मजहब पाया और अब मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि इस्लाम दुनिया का एकमात्र ऐसा मजहब है जो इंसाानियत और शांति को बढ़ावा देता है और इंसाफ की बात करता है।

14.11.13

इस्लाम विरोधी डच राजनेता ने अपनाया इस्लाम

क्या ये संभव है कि जीवन भर आप जिस विचारधारा का विरोध करते आए हों एक मोड़ पर आकर आप उसके अनुनायी बन जाएं. कुछ ऐसा ही हुआ है नीदरलैंड में.लंबे समय तक इस्लाम की आलोचना करने वाले डच राजनेता अनार्ड वॉन डूर्न ने अब इस्लाम धर्म कबूल लिया है.
अनार्ड वॉन डूर्न नीदरलैंड की घोर दक्षिणपंथी पार्टी पीवीवी यानि फ्रीडम पार्टी के महत्वपूर्ण सदस्य रह चुके हैं. यह वही पार्टी है जो अपने इस्लाम विरोधी सोच और इसके कुख्यात नेता गिर्टी वाइल्डर्स के लिए जानी जाती रही है

मगर वो पांच साल पहले की बात थी. इसी साल यानी कि 2013 के मार्च में अर्नाड डूर्न ने इस्लाम धर्म क़बूल करने की घोषणा की.
 नीदरलैंड के सांसद गिर्टी वाइल्डर्स ने 2008 में एक इस्लाम विरोधी फ़िल्म 'फ़ितना' बनाई थी. इसके विरोध में पूरे विश्व में तीखी प्रतिक्रियाएं हुईं थीं.
 "मैं पश्चिमी यूरोप और नीदरलैंड के और लोगों की तरह ही इस्लाम विरोधी सोच रखता था. जैसे कि मैं ये सोचता था कि इस्लाम बेहद असहिष्णु है, महिलाओं के साथ ज्यादती करता है, आतंकवाद को बढ़ावा देता है. पूरी दुनिया में इस्लाम के ख़िलाफ़ इस तरह के पूर्वाग्रह प्रचलित हैं."

15.8.13

इंग्लैंड की महिला पुलिस अफसर ने अपनाया इस्लाम

 अट्ठाइस वर्षीय पुलिस अधिकारी जेने केम्प ने घरेलू हिंसा से पीडि़त एक मुस्लिम महिला की मदद के दौरान इस्लामिक आस्था और विश्वास के बारे में जानने का निश्चय किया।  उन्होंने इस्लाम का अध्ययन किया और फिर इस्लाम अपनाकर मुसलमान बन गईं।
दो बच्चों की मां जेने केम्प ने बताया कि पुलिस अधिकारी के रूप में घरेलू हिंसा से पीडि़त एक मुस्लिम महिला की मदद के दौरान उसने इस्लाम को जाना और फिर इस्लाम से प्रभावित होकर इस्लाम कुबूल कर लिया।
इस्लाम के अध्ययन के दौरान केम्प ट्विटर पर कई मुस्लिमों के सम्पर्क में आईं, उनसे कई बातें जानीं और इस सबके बाद उन्होंने अपना कैथोलिक धर्म छोड़कर एक साल पहले इस्लाम धर्म अपना लिया और अब वे पूरी तरह इस्लाम के मुताबिक अपनी जिंदगी गुजार रही हैं। वे एक जिम्मेदार पुलिस अधिकारी के रूप में गश्त पर निकलती हैं लेकिन वे पूरी तरह इस्लामी हिजाब में होती हैं और अपनी ड्यूटी के समय को एडजेस्ट करके वे नमाज पढऩा नहीं भूलती हैं।
सात वर्षीय बेटी और नौ वर्षीय बेटे की सिंगल मदर जेने ने पिछले साल आधिकारिक रूप से इस्लाम अपना लिया और अपना नाम जेने केम्प से अमीना रख लिया। वे अपना  खाना खुद बनाती हैं ताकि वह पूरी तरह हलाल खाना हो।
जेने दक्षिण मेनचेस्टर में रहती हैं। वे कहती हैं, जहां मैं रहती हूं वहां एक बड़ी मस्जिद है और काफी तादाद में मुस्लिम रहते हैं। इस्लाम के प्रति दिलचस्पी के दौरान मैंने तय किया कि मुझे इन लोगों और इनके मजहब के बारे में ज्यादा से ज्यादा अध्ययन करना चाहिए।
जेने कहती हैं- 'पहले मैं सोचती थी कि इस्लाम तो महिलाओं को चूल्हा-चौका करने और घर में कैद रहने के लिए मजबूर करता होगा लेकिन मैंने इसमें ऐसा नहीं पाया बल्कि ये तो अपने समय से ही दूसरों के प्रति उदार और सम्मानपूर्ण व्यवहार की सीख देता है। मैंने पाया कि इस्लाम अपने पड़ोसियों का  खयाल रखने और उनके साथ अच्छे ताल्लुकात रखने को तरजीह देता है, वहीं बच्चों को माता-पिता को पूरा सम्मान देने और उन्हें उफ् तक न कहने की हिदायत देता है। मैंने आज के अन्य धर्मों को इस्लाम जैसा नहीं पाया। इस्लाम में मुझे अपने हर एक सवाल का जवाब मिला। दरअसल अब तो मुझे इस्लाम से बेहद लगाव हो गया।'

1.8.13

'पादरियों ने अपनाया इस्लाम'

'पादरियों ने  अपनाया इस्लाम' किताब में दुनिया के सात देशों के ग्यारह ईसाई पादरियों और धर्मप्रचारकों की इस्लाम अपनाने की दास्तानें हैं। गौर करने वाली बात है कि ईसाईयत में गहरी पकड़ रखने वाले ये ईसाई धर्मगुरु आखिर इस्लाम अपनाकर मुसलमान क्यों बन गए? आज जहां इस्लाम को लेकर दुनियाभर में गलतफहमियां हैं और फैलाई जा रही हैं, ऐसे में यह किताब मैसेज देती है कि इस्लाम वैसा नहीं है जैसा उसका दुष्प्रचार किया जा रहा है। पुस्तक पढऩे पर आपको मालूम होगा कि ये ईसाई पादरी अपने धर्म के प्रचार में जुटे थे और इनमें से कई तो ऐसे थे जो मुसलमानों को ईसाईयत की तरफ दावत दे रहे थे। लेकिन इस्लाम के रूप में जब सच्चाई इनके सामने आई तो इन्होंने इसे अपना लिया।  आज इस्लाम कुबूल करने वालों में एक बड़ी तादाद ईसाई पादरियों और धर्मप्रचारकों की है। ईसाई धर्मज्ञाताओं का इस्लाम को गले लगाने के बारे में कुरआन चौदह सौ साल पहले ही उल्लेख कर चुका है। गौर कीजिए कुरआन की इन आयतों पर -
तुम ईमान वालों का दुश्मन सब लोगों से बढकर यहूदियों और मुशरिकों को पाओगे और ईमान वालों के लिए मित्रता में सबसे निकट उन लोगों को पाओगे जिन्होंने कहा कि -हम ईसाई हैं।  यह इस कारण कि ईसाईयों में बहुत से धर्मज्ञाता और संसार त्यागी संत पाए जाते हैं। और इस कारण कि वे अहंकार नहीं करते। जब वे उसे सुनते हैं जो रसूल पर अवतरित हुआ है तो तुम देखते हो कि उनकी आखें आंसुओं से छलकने लगती हैं । इसका कारण यह है कि उन्होंने सच्चाई को पहचान लिया है।  वे कहते हैं-हमारे रब, हम ईमान ले आए। इसलिए तू हमारा नाम गवाही देने वालों में लिख ले। 
                                                               (5 : 82-83)

यहां पेश हैं किताब के कुछ अंश-
1 ब्रिटेन के अन्य लोगों की तरह पहले मुसलमानों को लेकर मेरा भी यही नजरिया था कि मुसलमान आत्मघाती हमलावर, आतंकवादी और लड़ाकू होते हैं। दरअसल ब्रिटिश मीडिया मुसलमानों की ऐसी ही तस्वीर पेश करता है। इस वजह से मेरी सोच बनी हुई थी कि इस्लाम तो उपद्रवी मजहब है। काहिरा में मुझो एहसास हुआ कि इस्लाम तो बहुत ही  खूबसूरत धर्म है-  
                        इदरीस तौफीक-इंग्लैण्ड-पूर्व कैथोलिक ईसाई    पादरी- पेज नं-28

2 वे कट्टर ईसाई थीं। लेकिन जब इस्लाम का अध्ययन किया और इस्लाम के रूप में सच्चाई सामने आई तो इसे अपना लिया।
  पूर्व पादरी, मिशनरी, प्रोफेसर और धर्मशास्त्र में मास्टर डिग्री धारक खदीजा स्यू वाट्सन की जुबानी कि वे किस तरह इस्लाम की आगोश में आईं।  पेज नं-36
3 इब्राहिम खलील अहमद जिनका पुराना नाम खलील फिलोबस था, पहले इजिप्ट के कॉप्टिक पादरी थे। फिलोबस ने धर्मशास्त्र में एम. ए. किया। इस्लाम को गलत रूप में पेश करने के मकसद से फिलोबस ने इसका अध्ययन किया। वे इस्लाम में कमियां ढूढऩा चाहते थे लेकिन हुआ इसका उलटा। वे इस्लाम से बेहद प्रभावित हुए और उन्होंने अपने चार बच्चों के साथ इस्लाम कबूल कर लिया। पेज नं-44
4 मैंने चर्च से इस्तीफा दे दिया और अल्लाह का शुक्र है कि मैं तभी से मुसलमान हूं। इस्लाम कुबूल करने के साथ ही  मेरी जिंदगी में अच्छे बदलाव आए।
                                          -जेसॉन क्रुज, अमेरिका-
पेज नं-54

28.6.13

ईसाई धर्म प्रचारक बन गया कुरआन का मुरीद

एक अहम ईसाई धर्म प्रचारक कनाडा के गैरी मिलर ने इस्लाम अपना लिया और वे इस्लाम के लिए एक महत्वपूर्ण संदेशवाहक साबित हुए। मिलर सक्रिय ईसाई प्रचारक थे और बाइबिल की शिक्षाओं पर उनकी गहरी पकड़ थी। वे गणित को काफी पसंद करते थे और यही वजह है कि तर्क में मिलर का गहरा विश्वास था।

एक अहम ईसाई धर्म प्रचारक कनाडा के गैरी मिलर ने इस्लाम अपना लिया और वे इस्लाम के लिए एक महत्वपूर्ण संदेशवाहक साबित हुए। मिलर सक्रिय ईसाई प्रचारक थे और बाइबिल की शिक्षाओं पर उनकी गहरी पकड़ थी। वे गणित को काफी पसंद करते थे और यही वजह है कि तर्क में मिलर का गहरा विश्वास था। एक दिन गैरी मिलर ने कमियां निकालने के  मकसद से कुरआन का अध्ययन करने का निश्चय किया ताकि वह इन कमियों को आधार बनाकर मुसलमानों को ईसाइयत की तरफ बुला सके और उन्हें  ईसाई बना सके। वे सोचते थे कि कुरआन चौदह सौ साल पहले लिखी गई एक ऐसी किताब होगी जिसमें रेगिस्तान और उससे जुड़े कहानी-किस्से होंगे। लेकिन उन्होंने कुरआन का अध्ययन किया तो वह दंग रह गए। कुरआन को पढ़कर वह आश्चर्यचकित थे। उन्होंने कुरआन के अध्ययन में पाया कि दुनिया में कुरआन जैसी कोई दूसरी किताब नहीं है। पहले डॉ. मिलर ने सोचा था कि कुरआन में पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. के मुश्किलभरे दौर के किस्से होंगे जैसे उनकी बीवी खदीजा रजि. और उनके बेटे-बेटियों की मौत से जुड़े किस्से। लेकिन उन्होंने कुरआन में ऐसे कोई किस्से नहीं पाए बल्कि वे कुरआन में मदर मैरी के नाम से पूरा एक अध्याय देखकर दंग रह गए। डॉ. मिलर ने  पाया कि मैरी के अध्याय सूरा मरियम में जो इज्जत और ओहदा पैगम्बर ईसा की मां मरियम को दिया गया है वैसा सम्मान उन्हें ना तो बाइबिल में दिया गया और ना ही ईसाई लेखकों द्वारा लिखी गई किताबों में वह मान-सम्मान दिया गया। यही नहीं डॉ. मिलर ने पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. की बेटी फातिमा रजि. और उनकी बीवी आइशा रजि. के नाम से कुरआन में कोई अध्याय नहीं पाया। उन्होंने जाना कि कु रआन में ईसा मसीह का नाम 25 बार आया है जबकि खुद मुहम्मद सल्ल. का नाम केवल चार बार ही आया है। यह सब जानने के बाद वे ज्यादा कन्फ्यूज हो गए। वे लगातार कुरआन का अध्ययन करते रहे इस सोच के साथ कि इसमें उन्हें जरूर कमियां और दोष पकड़ में आएंगे लेकिन कुरआन का अध्याय अल निशा की 82 आयत पढ़कर वे आश्चर्यचकित रह गए,  इस अध्याय में हैं-
क्या वे कुरआन में गौर और फिक्र नहीं करते। अगर यह अल्लाह के अलावा किसी और की तरफ से होती तो वे इसमें निश्चय ही बेमेल बातें और विरोधाभास पाते।

9.6.13

इस्लाम में है अमेरिकी रंग-भेद की समस्या का समाधान: मेलकॉम एक्स

यह एक अफ्रो-अमेरिकन  जाने-माने क्रांतिकारी मेलकॉम एक्स की इस्लाम का अध्ययन करने और फिर इसे अपनाने  की दास्तां है। मेलकॉम एक्स ने अमेरिका की रंग-भेद की समस्या का समाधान इस्लाम में पाया। मेलकॉम एक्स कहता था-मैं एक मुसलमान हूं  और सदा रहूंगा। मेरा धर्म इस्लाम है।
मशहूर मुक्केबाज मुहम्मद अली के साथ मेलकॉम
जाने-माने और क्रांतिकारी शख्स मेलकॉम एक्स का  जन्म 19 मई 1925 को नेबरास्का के ओहामा में हुआ था। उसके माता-पिता ने उसको मेलकॉम लिटिल नाम दिया था। उसकी मां लुई नॉर्टन घरेलू महिला थी और उसके आठ बच्चे थे। मेलकॉम के पिता अर्ल लिटिल स्पष्टवादी बेपटिस्ट पादरी थे। अर्ल काले लोगों के राष्ट्रवादी नेता मारकस गेर्वे के कट्टर समर्थक थे और उनके कार्यकर्ता के रूप में जुड़े थे। उनके समर्थक होने की वजह से अर्ल को गोरे लोगों की तरफ से धमकियां दी जाती थीं, इसी वजह से उन्हें दो बार परिवार सहित अपने रहने की जगह बदलनी पड़ी। मेलकॉम उस वक्त चार साल के थे। गोरे लोगों ने अर्ल के लॉन्सिग, मिशिगन स्थित घर को जलाकर राख कर दिया और इस हादसे के ठीक दो साल बाद अर्ल लिटिल का कटा-पिटा शव शहर के ट्रॉली-ट्रेक के पार पाया गाया। इस हादसे के बाद उनकी पत्नी और मेलकॉम की मां लुई का मानसिक संतुलन गड़बड़ा गया और उसे मनोचिकित्सालय में भर्ती कराना पड़ा। मेलकॉम की उम्र उस वक्त छह साल थी। ऐसे हालात में लुई के इन आठ बच्चों को  अलग-अलग अनाथालय की  शरण लेनी पड़ी।

9.5.13

श्रीलंकाई ईसाई पादरी इस्लाम की शरण में

जॉज एंथोनी श्रीलंका में कैथोलिक पादरी थे। एंथोनी की इस्लाम कबूल करने और अपना नाम अब्दुल रहमान रखने की दास्तां बड़ी रोचक और दिलचस्प है।  एक ईसाई पादरी के रूप में उनकी बाइबिल की शिक्षा पर अच्छी पकड़ थी। वे आज भी फर्राटे से बाइबिल की कई आयतों को कोट करते हैं। बाइबिल अध्ययन के दौरान उन्होंने पाया कि बाइबिल में कई विरोधाभास हैं। वे सिंहली भाषा में बाइबिल की उन आयतों का जिक्र करते हैं जो संदेहास्पद और विरोधाभाषी हैं।
वे कहते हैं कि बाइबिल में पैगम्बर मुहम्मद सल्ल.की भाविष्यवाणी की गई है। अब्दुल रहमान कहते हैं कि ईसाई ईसा मसीह को गॉड मानते हैं जबकि इसके विपरीत पवित्र बाइबिल में उन्हें एक इंसान के रूप में बताया गया है।
अब्दुल  रहमान कहते हैं कि ईसाइयत, बौद्ध धर्म और अन्य दूसरे धर्मों में ईश्वर द्वारा पैगम्बर भेजे जाने की अवधारणा इतनी स्पष्ट और प्रभावी नहीं है बल्कि कई पैगम्बारों के मामले में ये धर्म खामोश हैं जबकि इस्लाम में सभी पैगम्बरों को मानना और उन्हें पूरा-पूरा सम्मान देना जरूरी है। इस्लाम की यह अवधारणा और नजरिया हर किसी को प्रभावित करता है और उस पर अपना असर छोड़ता है।
अब्दुल रहमान कहते हैं कि रोमन कैथोलिक पादरी पर शादी का प्रतिबंध लगाने के पीछे कोई कारण समझ में नहीं आता जबकि ईसाइयों के अन्य कई दूसरे वर्गों के पादरी शादी कर सकते हैं। अब्दुल  रहमान ईसाइयत से जुड़े ऐसे ही विरोधाभास और शंकाओं पर विचार मग्र और सोच विचार कर रहे थे कि इस बीच उन्हें एक ऑडियो कैसेट हासिल हुई। यह ऑडियो कैसेट श्रीलंका के ईसाई पादरी शरीफ डी. एल्विस के बारे में थी जिन्होंने ईसाइयत छोड़कर इस्लाम अपना लिया था। इस्लामिक विद्वान अहमद दीदात की कई ऑडियो कैसेट्स  से भी अब्दुल रहमान  बेहद प्रभावित हुए। वे लगातार सच्चाई की तलाश में जुटे रहे और फिर एक दिन फादर जॉर्ज एंथनी इस्लाम अपनाकर अब्दुल रहमान बन गए।

26.4.13

इधर से गुजरता है कामयाबी का रास्ता

इस्लाम के आखरी पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. सभी इंसानों की रहनुमाई के लिए इस दुनिया में आए  थे। उनकी दी हुई शिक्षाएं और बताया हुआ रास्ता इंसानों के लिए बेहद फायदेमंद है। इंसानों का हित और कामयाबी उन्हीं के सुझाए मार्ग में छिपा है। हमें चाहिए कि हम इंसानियत के इस सच्चे रहनुमा के नक्शे कदम पर चलें और अपनी जिंदगी को  कामयाब बनाएं।
मुहम्मद सल्ल.  की दी हुई शिक्षाएं 'हदीस शास्त्र' के रूप में संजो ली गई ताकि आने वाली पीढिय़ां उस राह को समझकर सही पथ पर चलती रहें। यहां पेश है पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. की चुनिंदा शिक्षा। आप इन पर गौर और फिक्र कीजिए, आपको अंदाजा हो जाएगा कि ये बातें आज की कराह रही इंसानियत के लिए कितनी फायदेमंद और कारगर है।

●‘‘प्रत्येक धर्म का एक स्वभाव होता है। इस्लाम का स्वभाव लज्जा है।’’ (मालिक)
●जो व्यक्ति अपने छोटे-छोटे बच्चों के भरण-पोषण के लिए जायज़ कमाई के लिए दौड़-धूप करता है वह ‘अल्लाह की राह में’ दौड़-धूप करने वाला माना जाएगा।
● घूस लेने और देने वाले पर लानत है...कोई क़ौम ऐसी नहीं जिसमें घूस का प्रचलन हो और उसे भय व आशंकाए घेर न लें।
● सबसे बुरा भोज (बुरी दअ़वत) वह है जिसमें धनवानों को बुलाया जाए और निर्धनों को छोड़ दिया जाए।
● सबसे बुरा व्यक्ति वह है जो अपनी पत्नी के साथ किए गए गुप्त व्यवहारों (यौन क्रियाओं) को लोगों से कहता, राज़ में रखी जाने वाली बातों को खोलता है।
● यदि तुमने मां-बाप की सेवा की, उन्हें ख़ुश रखा, उनका आज्ञापालन किया तो स्वर्ग (जन्नत) में जाओगे। उन्हें दुख पहुंचाया, उनका दिल दुखाया, उन्हें छोड़ दिया तो नरक (जहन्नम) के पात्र बनोगे।
● ईश्वर की नाफ़रमानी (अवज्ञा) की बातों में किसी भी व्यक्ति (चाहे माता-पिता ही हों) का आज्ञापालन निषेध, हराम, वर्जित है।
● बाप जन्नत का दरवाज़ा है और मां के पैरों तले जन्नत है (अर्थात् मां की सेवा जन्नत-प्राप्ति का साधन बनेगी)।
● तुम लोग अपनी सन्तान के साथ दया व प्रेम और सद्व्यवहार से पेश आओ और उन्हें अच्छी (नैतिक) शिक्षा-दीक्षा दो।
● सन्तान के लिए माता-पिता का श्रेष्ठतम उपहार (तोहफ़ा, Gift) है उन्हें अच्छी शिक्षा-दीक्षा देना, उच्च शिष्टाचार सिखाना।
● तुममें सबसे अच्छा इन्सान वह है जो अपनी औरतों के साथ अच्छे से अच्छा व्यवहार करे।
● पत्नी के साथ दया व करुणा से पेश आओ तो अच्छा जीवन बीतेगा।

23.3.13

वुजू-बेहतर सेहत का अचूक नुस्खा

 अगर आप पांच वक्त की नमाज अदा करते हैं और हर वक्त आप ताजा वुजू बनाते हैं तो आप खुशकिस्मत हैं। क्योंकि वुजू स्वास्थ्य के लिहाज से बेहद कारगर नुस्खा है। वुजू की आदत हमें कई बड़ी-बड़ी परेशानियों से बचाए रखती है

 ऐ ईमान वालो! जब तुम नमाज के लिए तैयार हो तो अपने मुंह और कोहनियों तक हाथ धो लिया करो और अपने सिर पर मस्ह कर (गीला हाथ फेर) लिया करो और अपने पैरों को टखनों तक धो लिया करो। और अगर नापाक हो तो (नहाकर) पाक हो लिया करो, और अगर तुम बीमार हो या सफर में हो या तुममें से कोई शौच करके आया हो या तुमने औरतों से सोहबत (सहवास) की हो और तुमको पानी न मिल सके तो साफ मिट्टी से काम लो। उस पर हाथ मारकर अपने मुंह और हाथों पर फेर लो। अल्लाह तुमको किसी तरह की तंगी में नहीं डालना चाहता बल्कि वह चाहता है कि तुम्हें पवित्र करे और अपनी नेमत तुम पर पूरी कर दे ताकि तुम शुक्रगुजार बनो।                                                                                                                                      (कुरआन-5:6)
वुजू कुरआन के कई चमत्कारों में से एक बेहतरीन और उपयोगी नुस्खा है। जीव वैज्ञानिकों की मुश्किल से चालीस साल पहले हुई खोजों से ही हम यह जान पाए हैं कि वुजू में इंसानी सेहत के लिहाज से कितने चमत्कारिक फायदे छिपे हुए हैं।
 इंसानी सेहत के लिए मुख्य रूप  से तीन तरह के फायदे हैं जो उसकी बॉडी को धोने से जुड़े हैं। शरीर धोने के ये फायदे इनसे जुड़े हैं-
संचार प्रणाली, प्रतिरक्षा प्रणाली और  शरीर का इलेक्ट्रोस्टेटिक बेलेंस।
संचार प्रणाली- इंसानी बॉडी में संचार प्रणाली दोतरफा होती है। पहले दिल शरीर के हर हिस्से की उत्तक कोशिकाओं को खून सप्लाई करता है। फिर यह जैविक इस्तेमाल किया गया खून एकत्र करता है। अगर यह रिवर्स संचालन (दूसरा संचार) गड़बड़ा जाता है तो ब्लड प्रेशर  बढ़ जाता है और ऐसे हालात में इंसान की मौत तक हो जाती है। बेहतर सेहत और दोहरी संचार प्रणाली के लिए जरूरी है कि रक्त वाहिकाएं सही तरीके  से अपना काम अंजाम देती रहें। रक्त वाहिकाएं लचीले ट्यूब की तरह होती हैं जो दिल से दूर पतली शाखाओं के रूप में फैली रहती हैं। अगर ये पतले ट्यूब कठोर हो जाते हैं और अपना लचीलापन खो देते हैं तो दिल पर दबाव बढ़ जाता है। मेडिकल लैंग्वेज में इसे arteriosclerosis ( धमनी कठिनता) के रूप में जाना जाता है।
रक्त वाहिकाहों के लचीलापन खोने और कठोर होने के कई कारण होते हैं। उम्र बढऩे और शारीरिक  गिरावट, कुपोषण, नर्वस रिएक्शन्स आदि के चलते रक्त वाहिकाहों पर ऐसा बुरा असर पड़ता है।
रक्त वाहिकाओं का सिकुडऩा और कठोर होना एकदम से ही नहीं हो जाता बल्कि यह विकृति एक लंबा समय लेती है। ये वाहिकाएं जो दिल से दूर दिमाग, हाथ और पैरों तक फैली रहती है, इन रक्त वाहिकाओं में धीरे-धीरे यह शुरू होता है और लगातार ऐसा होने पर एक लंबे टाइम बाद इन रक्त वाहिकाओं में यह विकृति पैदा होती है।

8.3.13

इस्लाम में औरत का मुकाम : एक झलक

विश्व महिला दिवस
इस्लाम को लेकर यह गलतफहमी है और फैलाई जाती है कि इस्लाम में औरत को कमतर समझा जाता है। सच्चाई इसके उलट है। हम इस्लाम का अध्ययन करें तो पता चलता है कि इस्लाम ने महिला को चौदह सौ  साल पहले वह मुकाम दिया है जो आज के कानून दां भी उसे नहीं दे पाए।
इस्लाम में औरत के मुकाम की एक झलक देखिए।

जीने का अधिकार
शायद आपको हैरत हो कि इस्लाम ने साढ़े चौदह सौ साल पहले स्त्री को दुनिया में आने के साथ ही अधिकारों की शुरुआत कर दी और उसे जीने का अधिकार दिया। यकीन ना हो तो देखिए कुरआन की यह आयत-
          'और जब जिन्दा गाड़ी गई लड़की से पूछा जाएगा, बता तू किस अपराध के कारण मार दी गई?"                                                                                     (कुरआन, 81:8-9)
यही नहीं कुरआन ने उन माता-पिता को भी डांटा जो बेटी के पैदा होने पर अप्रसन्नता व्यक्त करते हैं-
       'और जब इनमें से किसी को बेटी की पैदाइश का समाचार सुनाया जाता है तो उसका चेहरा स्याह पड़ जाता है और वह दु:खी हो उठता है। इस 'बुरी' खबर के कारण वह लोगों से अपना मुँह छिपाता फिरता है। (सोचता है) वह इसे अपमान सहने के लिए जिन्दा रखे या फिर जीवित दफ्न कर दे? कैसे बुरे फैसले हैं जो ये लोग करते हैं।'
                                                  (कुरआन, 16:58-59)

बेटी
इस्लाम के पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. ने फरमाया-
बेटी होने पर जो कोई उसे जिंदा नहीं गाड़ेगा (यानी जीने का अधिकार देगा), उसे अपमानित नहीं करेगा और अपने बेटे को बेटी पर तरजीह नहीं देगा तो अल्लाह ऐसे शख्स को जन्नत में जगह देगा।
                                                    (इब्ने हंबल)
अन्तिम ईशदूत हजऱत मुहम्मद सल्ल. ने कहा-
'जो कोई दो बेटियों को प्रेम और न्याय के साथ पाले, यहां तक कि वे बालिग हो जाएं तो वह व्यक्ति मेरे साथ स्वर्ग में इस प्रकार रहेगा (आप ने अपनी दो अंगुलियों को मिलाकर बताया)।
मुहम्मद सल्ल. ने फरमाया-
जिसके तीन बेटियां या तीन बहनें हों या दो बेटियां या दो बहनें हों और वह उनकी अच्छी परवरिश और देखभाल करे और उनके मामले में अल्लाह से डरे तो उस शख्स के लिए जन्नत है। (तिरमिजी)
पत्नी
वर चुनने का अधिकार : इस्लाम ने स्त्री को यह अधिकार दिया है कि वह किसी के विवाह प्रस्ताव को स्वेच्छा से स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है। इस्लामी कानून के अनुसार किसी स्त्री का विवाह उसकी स्वीकृति के बिना या उसकी मर्जी के विरुद्ध नहीं किया जा सकता।
बीवी के रूप में भी इस्लाम औरत को इज्जत और अच्छा ओहदा देता है। कोई पुरुष कितना अच्छा है, इसका मापदण्ड इस्लाम ने उसकी पत्नी को बना दिया है। इस्लाम कहता है अच्छा पुरुष वही है जो  अपनी पत्नी के लिए अच्छा है। यानी इंसान के अच्छे होने का मापदण्ड उसकी हमसफर है।
पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. ने फरमाया-
तुम में से सर्वश्रेष्ठ इंसान वह है जो अपनी बीवी के  लिए सबसे अच्छा है। (तिरमिजी, अहमद)
शायद आपको ताज्जुब हो लेकिन सच्चाई है कि इस्लाम अपने बीवी बच्चों पर खर्च करने को भी पुण्य का काम मानता है।
 पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. ने फरमाया-
तुम अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए जो भी खर्च करोगे उस पर तुम्हें सवाब (पुण्य) मिलेगा, यहां तक कि उस पर भी जो तुम अपनी बीवी को खिलाते पिलाते हो। (बुखारी,मुस्लिम)।
पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. ने कहा-
आदमी अगर अपनी बीवी को कुएं से पानी पिला देता है, तो उसे उस पर बदला और सवाब (पुण्य) दिया जाता है। (अहमद)
मुहम्मद सल्ल. ने फरमाया-
महिलाओं के साथ भलाई करने की मेरी वसीयत का ध्यान रखो। (बुखारी, मुस्लिम)
माँ
क़ुरआन में अल्लाह ने माता-पिता के साथ बेहतर व्यवहार करने का आदेश दिया है,
'तुम्हारे स्वामी ने तुम्हें आदेश दिया है कि उसके सिवा किसी की पूजा न करो और अपने माता-पिता के साथ बेहतरीन व्यवहार करो। यदि उनमें से कोई एक या दोनों बुढ़ापे की उम्र में तुम्हारे पास रहें तो उनसे 'उफ् ' तक न कहो बल्कि उनसे करूणा के शब्द कहो। उनसे दया के साथ पेश आओ और कहो-
'ऐ हमारे पालनहार! उन पर दया कर, जैसे उन्होंने दया के साथ बचपन में मेरी परवरिश की थी।'
                                                                                             (क़ुरआन, 17:23-24)

इस्लाम ने मां का स्थान पिता से भी ऊँचा करार दिया। ईशदूत हजरत मुहम्मद (सल्ल.) ने कहा-
'यदि तुम्हारे माता और पिता तुम्हें एक साथ पुकारें तो पहले मां की पुकार का जवाब दो।'
एक बार एक व्यक्ति ने हजरत मुहम्मद (सल्ल.) से पूछा
'हे ईशदूत, मुझ पर सबसे ज्यादा अधिकार किस का है?' 
उन्होंने जवाब दिया 'तुम्हारी माँ का', 
'फिर किस का?' उत्तर मिला 'तुम्हारी माँ का',
 'फिर किस का?' फिर उत्तर मिला 'तुम्हारी माँ का' 
तब उस व्यक्ति ने चौथी बार फिर पूछा 'फिर किस का?' 
उत्तर मिला 'तुम्हारे पिता का।'
संपत्ति में अधिकार-औरत को बेटी के रूप में पिता की जायदाद और बीवी के रूप में पति की जायदाद का हिस्सेदार बनाया गया। यानी उसे साढ़े चौदह सौ साल पहले ही संपत्ति में अधिकार दे दिया गया।

अगर आपको अब भी इन सब बातों पर यकीन ना हो तो आप पढें यह किताब- हमें खुदा कैसे मिला? इस किताब में आधुनिक और प्रगतीशील कहे जाने वाले यूरोपीय देशों की महिलाओं के इंटरव्यू है, वे बताती हैं कि आखिर उन्होंने इस्लाम क्यों अपनाया।
इस्लाम में औरत के अधिकार को समझाने के लिहाज से ये किताबें भी आपके लिए महत्वपूर्ण साबित होंगी। क्लिक कीजिए और पढि़ए ये पुस्तकें-
पैगम्बर  सल्लल्लाहु अलेहि व सल्लम और महिला का सम्मान
स्टेटस ऑफ वुमन इन इस्लाम
वुमन राइट्स इन इस्लाम